यूं चल निकलेगा मुबारकबाद का सिलसिला,
कि मेरी कब्र पर भी,
वो फूल ले आयेंगे।
और कुछ इस तरह ही होगी हासिल,
उनके गुलाब की खुशबू,
ये हमें पता न था।
क्या कहें,
उनके इश्क का अन्दाज़,
ह्में पसन्द आया।
ळोग तो बस नाम के लिये चन्द लम्हें रुककर चल दिये,
मगर विदा करने "खुदा" खुद आयेगा,
ये हमें पता न था।
मुबारकबाद चलती रही,
चलता रहा फूलों का दौर भी,
मेरी पास बैठा था आज कोई और भी।
वो आज बे-इन्तहा प्यार,
कुछ इस कद्र जतायेंगे,
ये हमें पता न था।
टूट रही थी कहीं,
कुछ और साँसों की डोर भी,
हो रहा था हल्का सा शोर भी।
मैं बस इतना ही सुन पाया उस शोर में,
"गगन! तेरी मोहब्बत कुछ इस तरह खींच लायेगी,
ये हमें पता न था।"
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