Tuesday, January 13, 2015

इन्सान हैवान आज भी है (Dedicated to the children killed in Pakistan on Dec. 16, 2014)

उफ़! बस यही निकला देखकर,
वो खतरनाक, वो दर्दनाक मौत का मंज़र।
सोचता हूँ देखकर तस्वीरें ही 'गगन' की कलम रो पड़ी,
पर देखकर हकीकत में हर बशर को इक सिसकी तो आयी होगी।

हालत क्या होगी उस माँ की सोचो,
जो तैयार करके स्कूल छोड़ आयी होगी।
कहने को तो बाप रोते नहीं हैं,
पर इक हिचकी आज उस शख्स को भी आयी होगी।

कहीं फटी किताबें, कहीं इक जूता, तो कहीं पेंसिल ही थी,
सजी हुई ज़मीन खूब, खून के धब्बों से थी।
कसम से एक ऐसी खौफनाक मौत,
रब्बे इश्क को भी न कभी आयी होगी।

बख़्शे खुदा जन्नत उन नन्हें परिदों को,
ज़रा भी न मासूमियत दिखी उन दरिदों को।
ए खुदा! न लिखना ऐसी ज़िदगी रकीब की भी,
लिखते हुए तुझे भी हर इक माँ की याद तो आयी होगी।

गोलियाँ, बारूद के ढेर, परमाणु बम के खिलौने,
यही भाषा, यही धर्म, न बन जाये कहीं।
JESUS, अल्लाह, वाहेगुरु, भगवान् को भी,
आज अपनी कायनात याद आयी होगी।

कत्लेआम का होना सियासत की आड़ में लाज़मी है,
मौत को तो आना है, बात ये आम-सी है।
पर ऐसी मौत की शक्ल, बताता है अक्सर,
इन्सान हैवान आज भी है।