दिन प्रतिदिन बढ़ रहे,
सही और गलत के अंतरद्वन्द में,
आवाम सारी बढ़ रही है,
साम्प्रदायिकता के कोप भवन में।
किसी के वजूद का आकलन,
प्रतिबधता की कसौटी नहीं रहा,
बार बार फंस जाता है बस,
पैर फिर क्यों उसी भंवर में।
कुछ कदम तो तय करते हैं राह डगर की,
कुछ ले लेते हैं राहें पतन की,
"गगन" में उड़ते हैं जो परिंदे,
सही और गलत के अंतरद्वन्द में,
आवाम सारी बढ़ रही है,
साम्प्रदायिकता के कोप भवन में।
किसी के वजूद का आकलन,
प्रतिबधता की कसौटी नहीं रहा,
बार बार फंस जाता है बस,
पैर फिर क्यों उसी भंवर में।
कुछ कदम तो तय करते हैं राह डगर की,
कुछ ले लेते हैं राहें पतन की,
"गगन" में उड़ते हैं जो परिंदे,
आशियाना बनाते ज़मीं पे ही हैं।