Tuesday, May 20, 2014

अंतरद्वन्द!!!

दिन प्रतिदिन बढ़ रहे,
सही और गलत के अंतरद्वन्द में,
आवाम सारी बढ़ रही है,
साम्प्रदायिकता के कोप भवन में।


किसी के वजूद का आकलन,
प्रतिबधता की कसौटी नहीं रहा,
बार बार फंस जाता है बस,
पैर फिर क्यों उसी भंवर में।


कुछ कदम तो तय करते हैं राह डगर की,
कुछ ले लेते हैं राहें पतन की,
"गगन" में उड़ते हैं जो परिंदे,
आशियाना बनाते ज़मीं पे ही हैं।

Tuesday, May 6, 2014

देख तो ज़रा गौर से...

देख तो ज़रा गौर से,
रहा है गुज़र ये देश...इक दौर से,
सारा ज़हर बहाकर ले जाएगा अपने साथ,
ये सच्चाई का सैलाब सब और से।


गूंजेगा "गगन" में शंखनाद,
बरसेंगे बादल भी खास तौर से,
आँसू खुशी के होंगे आँखों में,
होंगे शब्द भी मेरे भाव-विभोर से।


तू देख तो ज़रा गौर से,
देख तो ज़रा गौर से |